मंगलवार, 28 जून 2011

इसे 'बेशर्मी मोर्चा' भले ही कहा जा रहा हो पर बेशर्म नहीं है यह... बेशर्म तो वह समाज है जहाँ इस तरह के मोर्चे निकालने की जरूरत महसूस की जाती है!

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यॉर्क विश्व विद्मालय में हो रही एक चर्चा के दौरान टोरंटो पुलिस के कान्स्टेबल Micheal Sanguinetti ने सुझाव दिया  that, in order not to be victimized , " Women should avoid dressing like SLUTS. "


इस मानसिकता के जवाब में Sonya Barnett व Heather Jarvis के नेतृत्व में ३००० महिलाओं ने क्वीन्स पार्क से टोरंटो पुलिस हेडक्वार्टर्स तक मार्च किया व इस विरोध-मार्च को कहा SLUTWALK !(लिंक)


विरोध स्वरूप किया जा रहा यह मार्च इस बात के लिये कतई नहीं है कि स्त्रियों को अंग दिखाने वाले गहरे गले के वस्त्र या टांगें दिखाने वाली छोटी स्कर्ट पहनने की आजादी चाहिये... बल्कि यह मार्च सारे समाज को यह याद दिलाने के लिये है कि समाज की हर महिला को यह अधिकार है कि कोई भी उसके साथ अनुचित स्पर्श, शाब्दिक या शारीरिक कामुकतापूर्ण उत्पीड़न, बलात्कार यहाँ तक कि हत्या भी न करे, सिर्फ इसलिये कि वह एक स्त्री है, अपना खुद का एक दिमाग भी रखती है तथा समाज के थोड़े से पर अति मुखर एक वर्ग द्वारा प्रेस्क्राइब्ड एक तथाकथित आदर्श आचार-पहनावे को नकार अपनी पसंद , काम व सुविधा के अनुसार कपड़े पहने है !


दिल्ली में इस विरोध मार्च का आयोजन होगा बेशर्मी मोर्चा के नाम से २४ जुलाई को (लिंक)...

अपना सवाल सीधा-सादा है ...




क्या आप बेशर्मी मोर्चा के साथ हैं ? यदि नहीं तो अवश्य ही बतायें कि आखिर क्यों ?










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18 टिप्‍पणियां:

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

इस बाइ हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं, जनाब!

Neeraj Rohilla ने कहा…

हमारी राय में ये एक बेशर्म मोर्चा नहीं है, और हम इसके साथ हैं।

Learn By Watch ने कहा…

कांस्टेबल की टिप्पणी निंदनीय है पर इस SLUTWALK के बारे में तो महिलाएं ही कुछ कहें तो ही सही होगा

रचना ने कहा…

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/slut-slut.html


i have already said what i wanted to say and as usual the woman folk of hindi bloging community is silent

anshumala ने कहा…

इस तरह का मोर्चा दुनिया के लिए पहली बार होगा किन्तु भारत के लिए ये नया नहीं है | आज से सालो पहले देश के पूर्वोत्तर भाग में सेना के जवानो द्वारा वहा की लडियो के बलात्कार और हत्या की घटना के विरोध में ४५ से ६० साल की २० -२५ महिलाओ ने बिलकुल निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किया था सेना के खिलाफ और नारे लगाये थे की आओ और हम से बलात्कार करो और ये सब मिडिया के सामने ( मिडिया को वहा तो जाने की भी इजाजत नहीं थी) या उसे दिखाने के लिए नहीं हुआ था उसके बाद भी घरो से छतो से छुप कर उसे सुट किया गया और लगभग हर चैनल पर उसे दिखाया भी गया था पर लोगो की यादास्त बड़ी कमजोर है |

रचना ने कहा…

praveen i dont have a facbook account if you have one then i would request you to please post naari blog link on the face book link given within your post

readers of praveens blog if any of you could do it i would be obliged

रचना ने कहा…

प्रवीण
हम दूर क्यूँ जाते हैं इस ब्लॉग जगत में जितनी बेहूदा बेशर्मी से भरी पोस्ट मेरे ऊपर आयी हैं शायद ही किसी के ऊपर आयी हो . और महज इस लिये क्युकी मैने नारी ब्लॉग बना कर मोरल पोलिसिंग की ब्लॉग जगत के उन पुरुषो की जो नितान्त बेहुदे हैं और महिला को दोयम का दर्जा देते हैं . मोरल पोलिसिंग के पुरुष के अधिकार को मैने अपने हाथ में ले लिया तो तिलमिला गया वो पुरुष समाज जो हमेशा महिला के ऊपर मोरल पोलिसिंग करता रहा हैं और फिर मेरे ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप लगते रहे और लोग दांत निपोरते रहे . आप , नीरज रोहिला , निशांत मिश्र , अमित , हिमांशु , दीप पाण्डेय , कुछ गिने चुने नाम हैं जिन्होने हर समय आपत्ति दर्ज की ऐसी पोस्ट पर . बाकी वो जो अपने को बड़ा भाई , दादा { पिता के पिता } , चाचा इत्यादि कहते हैं हमेशा चुप रहे और तमाशा देखते रहे क्युकी उनको ब्लॉग पर टीप चाहिये अपने अपने . महिला को बेशर्म कहना उतना ही आसन हैं जितना पुरुष को कहना
थूकने का मन करता हैं मेरा जब जो मेरे ऊपर बेशर्मी की हद को पार करती हुई पोस्ट अपने ब्लॉग पर लगाते हैं , कमेन्ट मोद्रशन के बाद भी अप्रोव करते हैं वही दूसरे ब्लॉग पर जा कर जहां किसी पुरुष ने नारी विषय पर पोस्ट दी हो तुरंत अपनी सहमति दर्ज कराते हैं
आज भी हिंदी ब्लॉग जगत की महिला कुछ को छोड़ दे तो ऐसी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं करती , डरती हैं लोग क्या समझेगे .
ब्लॉग जगत में पांच साल पूरे कर लिये हैं आप का साथ हमेशा सुखद अनुभूती देता रहा शुक्रिया . आप का ईमेल नहीं था वरना व्यक्तिगत मेल दे कर ही थैंक्स कहती

अरूण साथी ने कहा…

आपसे सौ प्रतिशत सहमत।
यह मार्च तो समाज को आइना दिखाना है और जब इस आइने में अपना विदु्रप चेहरा दिखेगा तो किसी अच्छा लगेगा।

राजन ने कहा…

अंशुमाला जी से घनघोर सहमति.राजकोट की पूजा चौहान ने भी बचपन से लगातार अपने यौन शोषण के खिलाफ सेमी न्यूड मार्च किया था और मीडिया ने इसे भरपूर कवरेज दिया था. इस समय ये समझने की जरूरत है कि विरोध किस बात का किया जा रहा है न कि ये कि किस तरह किया जा रहा है.यहाँ केवल तर्क की नहीं बल्कि संवेदनशीलता कि जरूरत है.एक महिला अपने शराबी पति से पिटने के बाद उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाने जाती है पुलिसवाला रिपोर्ट न लिखकर उसे ही कायदे से रहने की सलाह देता है.ये महिला थाने के बाहर आ चिल्लाने लगती है कि दुनिया का हर मर्द कमीना होता है.अब वो चाहे कितनी ही गलत भाषा बोल रही है या अतार्किक बात कर रही है लेकिन फिर भी उस समय हम उसकी बातों में तर्क ढूढने के बजाए उसकी तकलीफ समझते है.लेकिन यहाँ तो मुद्दा पूरी तरह तार्किक है फिर इसे समझने के लिये हम अपने विवेक का प्रयोग क्यों नहीं करते.

रचना ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजन ने कहा…

रचना जी की बात बिल्कुल सही है पुरूष अपने ऊपर किसी तरह का नियंत्रण नहीं चाहते.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

स्त्रियों की लड़ाई जायज है। उन के पास संघर्ष के सिवा कोई मार्ग नहीं। उन्हें अभी और बहुत लड़ाई लड़नी है। मैं उन के संघर्ष के साथ हूँ।

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

"जरा विचार करें. हमें बचपन से सिखाया जाता है की जब हम सड़क पार करते हैं तो हमें दायें और बाएं देख लेना चाहिए और जब सब कुछ सुरक्षित हो तभी सड़क पार करनी चाहिए. इसी तरह से वाहन चालकों को भी समझाया जाता है की सड़क पर सुरक्षित तरीके से वाहन चलायें. पर क्या होता है ? रोजाना कोई न कोई पैदल यात्री सड़क पर घायल हो ही जाता है. इस पर अगर कोई अधिकारी इस बात को दोहरा दे की सड़क पर देख भाल कर ही चलाना चाहिए तो क्या इस बात का विरोध करने के लिए पैदल यात्री आंख पर पट्टी बांध कर सड़क पर चलना शुरू कर देंगे.


मुझे इन महिलाओं का ये आन्दोलन वैसा ही लगता है जैसे की पैदल यात्री सड़क पर वाहन चालकों को ढंग से वाहन चलने की सीख देने के लिए आँखों में पट्टी बांध कर बीच सड़क पर चलना शुरू कर दें. "


उपरोक्त टिपण्णी मैंने रचना जी की "बेशर्मी मोर्चा" विषय पर लिखी पोस्ट पर की थी. इस पर रचना जी ने बताया की विदेशों के लोग इतने सभ्य हैं की वहां बड़े से बड़ी गाड़ियाँ पैदल चलने वालों के सम्मान में रुक जाती हैं. दूसरी तरफ घुघूती जी को स्त्री की तुलना पैदल यात्री से किया जान अखर गया. इन लोगों ने मेरी बात नहीं समझी. मैं दुबारा आपकी पोस्ट के माध्यम से कोशिश करता हूँ.


रचना जी को मैं सन्देश देना चाहूँगा की जिस सभ्य समाज में पैदल यात्रियों के सम्मान में बड़ी बड़ी गाड़िया रुक जाती हैं वहीँ इस बेशर्मी मोर्चे की परिकल्पना की गयी है. सोचें जब ऐसे सभ्य समाज की स्त्रियों को ऐसे मोर्चे का सहारा लेना पड़ रहा है तो हमारे समाज की बात तो छोड़ ही दें जहाँ लड़कियों को पैदा होने ही नहीं दिया जाता है.


अब मैं घुघूती जी के लिए एक दूसरा उदहारण दूंगा. शायद इस बार उन्हें बुरा ना लगे.


कोई व्यक्ति खेत में काम कर रहा है और वहा उसे कोई सर्प डस ले. इसके बाद लोग बाग़ सापों के विरुद्ध अभियान छेड़ दें की इनके विषदंत ही तोड़ दिए जाय तो क्या होगा? क्या आप ऐसे आन्दोलन का समर्थन करेंगी या फिर ये कहेंगे की खेत में जाते वक्त सावधान रहो. वैसे तमाम सावधानियों के बावजूद जब भी सर्प और मानव का अमन सामना होगा कभी न कभी तो सर्पदंश की संभावना हो ही जाएगी. तो क्या सर्प प्रजाति को ख़त्म कर दिया जाय या फिर उसकी ऐसी प्रजाति विकसित की जय जो विषहीन हो.


पता नहीं क्यों लोग प्राकृतिक तौर तरीकों का सम्मान नहीं करना चाहते. क्यों वो चाहते हैं की कोई प्रजाति अपना प्राकृतिक स्वाभाव बदल ले. मानव की इस प्रवत्ति ने ही ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं पैदा कर दी हैं. प्रकृति गर्मी देती है उसे सहने के लिए कूलर से संतुष्ट नहीं होते बल्कि ए सी का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं.


पुरुष का स्त्री की और सेक्सुअल आकर्षण एक प्राकृतिक बात है. इस बात का सम्मान तो करना ही होगा. इस नियंत्रित करने के लिए कठोर कानून बनाये जा सकते हैं पर तब भी स्त्रियों को कुछ नियम कानूनों का पालन तो करना ही होगा.


किसी प्रजाति के basic instincts को नाकारा नहीं जा सकता और मुझे ये आन्दोलन उस मूल प्रवत्ति को नकारते हुए या एकदम ख़ारिज करते हुए दीखते हैं इसलिए मैं इनका समर्थन नहीं कर सकता .

सतीश सक्सेना ने कहा…

इस बुजदिल समाज के लिए कुछ भी शर्मनाक नहीं है ! इनकी आँखें खोलने के लिए हमारी बेटियों को शर्म छोड़ कर आगे आना होगा ! मगर तब भी इन्हें शर्म आएगी ...?
शक है !
शुभकामनायें आपको !

रचना ने कहा…

विचार शून्य जी
मैने और घुघूती जी दोनों ने आप की बात को पूरी तरह समझा और उसी बात को पकड़ कर आप को बताया की आप जो कह रहे हैं उसका इस सन्दर्भ में क्या मतलब हैं .
हम दोनों ने जो बात आप के कमेन्ट के जवाब में नारी ब्लॉग पर कही उसका सीधा मतलब इतना ही हैं अगर नारी को इंसान नहीं समझोगे तो इन सब मोर्चो के सहारे वो अब अपने इंसान होने का सबूत दे रही हैं
३ साल पहले सारथी चिट्ठे पर भी यही कहा जाता था की पुरुष की प्राकृतिक जरूरत की वजह से स्त्री को अपना व्यवहार संतुलन करना चाहिये और तब मैने पूछा था अगर पुरुष में कोई ब्योलोजिकल डिसआर्डर हैं यानी जनम जात बीमारी तो इसकी सजा स्त्री को क्यूँ मिले . इसके लिये पुरुष को क्यूँ नहीं आत्म सयम का पाठ पढाया जाता हैं
आप के कमेन्ट से घूम कर बात वही आ जाती हैं woman are born to please man
जिसके विद्रोह में ही ये सब मोर्चे निकल रहे हैं
स्त्री को क्या पसंद हैं और क्या नहीं इसका फैसला अब वो अपनी मर्ज़ी से करना चाहती हैं पुरुष को प्रधानता दे कर नहीं

Arvind Mishra ने कहा…

जैसा कि भारत में अक्सर होता है हम पश्चिमी विचारों की भोंडी अधकचरी नक़ल करते हैं अन्यान्य कारणों से -
वही हुआ ....यहाँ भी -रंडापा!

Arvind Mishra ने कहा…

यह बात यहीं कहनी उचित रहेगी -क्योंकि यहाँ पब्लिक (मजमा ) काम भर का जुट गया है :)
शर्ट पहने पुरुष अपने वक्ष को खोल कर दिखाते हुए अक्सर दिख जाते हैं -आईये हमें कोई इतराज नहीं है आप भी ऐसा परिधान पहनिए -आगे आईये हिम्मत दिखाईए -हम आपका स्वागत करते हैं! जब ऐसा करने की पहल आप करें तभी लंतरानी छेड़े! है हिम्मत?

रचना ने कहा…

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/slut-slut.html