रविवार, 28 अक्तूबर 2012

गाय का गोबर और दही का सम मात्रा में मिलना घातक है... बिच्छू डंक मार सकता है आपको...

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वे एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ज्योतिषी-ब्लॉगर व राजनीतिज्ञ हैं... वे ज्योतिष की वैज्ञानिकता व वैज्ञानिक नियमों का लाभ दुनिया को देते एक क्रांतिकारी स्वर हैं... एक जगह वे लिखते हैं...

प्रकृति में सत रज और तम के परमाणुओं का सम्मिश्रण पाया जाता है और ये विषम अवस्था में होते हैं तभी सृष्टी का संचालन होता है.इन तीनों की सम अवस्था ही प्रलय की अवस्था है.प्रकृति में हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और कोई भी दो तत्व मिल कर तीसरे का सृजन करते हैं.उदाहरण के लिए गाय के गोबर और दही को एक सम अवस्था में किसी मिटटी के बर्तन में वर्षा ऋतु में बंद कर के रख दें तो बिच्छू का उद्भव हो जायेगा जो घातक जीव है (लिंक),

डिग्री स्तर तक जीव विज्ञान का विद्मार्थी मैं भी रहा हूँ... यह मेरे लिये अनूठी जानकारी है...

मैं सोच में पड़ गया हूँ...


बिच्छू अगर ऐसे पैदा होता है तो गाय कैसे हुई होगी... और आदमी ?

आपको कुछ आईडिया है ?






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10 टिप्‍पणियां:

Manu Tyagi ने कहा…

पर इस जानकारी का श्रोत क्या है कि बिच्छू ऐसे बनता है

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वहाँ आगे यह भी लिखा है....

अब यदि rectified sprit में बिच्छू को पकड कर डाल दें और जब स्प्रिट में उसका विलयन हो जाए तो फ़िल्टर से छान कर सुरक्षित रखने पर वही बिच्छू दंश उपचार हेतु सटीक औषधी है।
...क्या यह सही है? मैं तो वाणिज्य का विद्यार्थी रहा हूँ, कुछ भी नहीं जानता। :)

रचना ने कहा…

मैं तो वाणिज्य का विद्यार्थी रहा हूँ, कुछ भी नहीं जानता। :)

aap e commerce kae baarey me to jantae hongae:) naa jaanae kitni ssait yae sab baechti haen

Arvind Mishra ने कहा…

एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लॉगर-घोर आपत्ति इस पर केवल अनूप जी का स्वत्वाधिकार है और मेरे लिए है !
बाकी तो गधे आज भी हैं और ब्लागिंग में दुर्भाग्य से ज्यादा हैं -हिटलर होता तो गैस चैंबर में डाल देता इन्हें -मानवता के बोझों को !

Arvind Mishra ने कहा…

बिच्छू दंश उपचार हेतु सटीक औषधी है-ऐलोपैथी में भी नहीं है बिच्छू के दंश का उपचार -कई बच्चे मर जाते हैं श्वसन नली के अवरुद्ध होने से-ऐसे नीम हकीम मानवता के लिए घातक हैं !

प्रवीण शाह ने कहा…

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सही कर दिया है, अपन को किसी कॉपीराइट के मामले में नहीं फंसना माँगता... :))



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अली सैयद ने कहा…

कनपटी तक मुस्कराने की दो कोशिशें बेकार गईं ! उन्हें डिलीट कर दीजियेगा !

arun prakash ने कहा…

ye darvin ke baap hai aaj kal fashion ho gaya hai yahb sab ul jalool bate karane ka jaise positive energy va negative energy vala concept har jagah sunaai deta hai

अनूप शुक्ल ने कहा…

वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लॉगर वाली बात पर कापी-पेस्ट की सुविधा का उपयोग करते हुये मिसिर जी की पोस्ट पर की गयी टिप्पणी यहां सटा रहे हैं:

जहां तक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लॉगर का खिताब अता करने की बात है तो मिसिरजी ने अपने कई लेखों में खुद को वैज्ञानिक चेतना संपन्न बताया है। उसी को देखते हुये हमने मौज लेने के लिये उनको ’वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लॉगर ’कहना शुरु किया जिसे उन्होंने भोलेपन के साथ खिताब अता करना बताया। हम तो उन्हें वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लॉगर इसलिये कहते हैं क्योंकि हमें पता है कि जब हम यह लिखते हैं तो उसे पढ़कर वे सुलग जाते हैं ( मिसिर जी के ही शब्दों में - हाँ जब वे मुझे वैज्ञानिक चेतना संपन्न कहते हैं तो मेरी सुलग जाती है :)।

बाकी हम तो सवाल भी किये हैं: मिसिरजी वैज्ञानिक चेतना संपन्न कैसे हुये? क्या कुछ सौ वैज्ञानिक लेख लिखकर कोई वैज्ञानिक चेतना संपन्न कहला सकता है?
लेकिन कौन पूछेगा भला? मिसिरजी से सब डरते हैं। :)
हम भी पूछ थोड़ी रहे हैं एक बात कह रहे हैं बस्स! :)


कुल मिलाकर हम यही बताना चाहते हैं कि मिसिरजी को यह खिताब अपन ने सिर्फ़ और सिर्फ़ सुलगाने के लिये अता किया है। यह मात्र उनकी सुलग चेतना से संबंधित है। इसका उनकी या अन्य किसी की वैज्ञानिक चेतना से कुच्छ लेना-देना नहीं है। हमारी दी हुई उपाधि के आधार पर अगर कोई मिसिरजी को वैज्ञानिक चेतना संपन्न मानता है तो उसके लिये मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है। वैसे भी फ़ैशन के दौर में गारन्टी चलती नहीं है।

मिसिरजी अनूप शुक्ल’फ़ुरसतिया’ को खुलुस और प्यार से ब्लॉग व्यंग्य विधा शिरोमणि की उपाधि से नवाजते हैं उसके लिये फ़िलहाल तो हम आभार प्रकट कर देते हैं और यह बयान जारी करते हैं कि हम उनकी इस उपाधि के काबिल बनने की कोशिश करते रहेंगे।

यह टिप्पणी इसी प्रयास के चलते की गयी। इसका मिसिरजी की वैज्ञानिक चेतना से कुछ लेना-देना नहीं है। :)

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता ने कहा…

बहुत लम्बी और मूर्खतापूर्ण हो जायेंगी मेरी टिप शायद यहाँ , लेकिन फिर भी

गाय के गोबर के साथ , घास के साथ खाए हुए बीज सम्पूर्ण ही निकल आते हैं । ऋषि कणाद इन्ही बीजों से जीवन यापन करते -थे संसार के रिसोर्सेज की वेस्टेज न होने के लिए ।

इसी तरह से - हो सकता है - जो घास किसी गाय ने खाई हो, उसमे बिच्छू के अंडे हों ? जो गोबर में ऐसे ही निकल आये हों ? (जीव विज्ञानी नहीं - हूँ नहीं जानती कि बिच्छू अंडे देते हैं या नहीं) और किसी ने ऐसे गोबर को गोबर गैस आदि जैसे कारणों से बंद किया हो, तो खोलने पर उसमे बिच्छू मिले हो ? कौन जाने कौनसी अफवाह किस कारण से शुरू होती है ?